Mahanthi Ramaraju
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ध्यान-महिला

ध्यान-महिला का उद्देश्य है, महिलाओं एवं लड़कियों को घरेलू कामों तक सीमित न रखकर, उन्हें अपने प्रति कर्तव्यों एवं जीवन लक्ष्यों के प्रति जगाने हेतु ध्यान-महिला प्रोजेक्ट कार्यरत है।


आधुनिक युग में विश्व एक रूपांतरण युग से गुजर रहा है। आज समाज के प्रत्येक क्षेत्र में स्त्री को अग्रण्य स्थान प्राप्त है। आज विश्व-क्रांति के बुनियादी मूल्यों में परिवर्तन हो रहा है। सभी वर्ग समान रूप से शिक्षित और विकसित होने के लिए आंदोलन कर रहे हैं।


नारी समाज के मूल इकाई का महत्त्वपूर्ण अंग है, यदि नारी को सम-शिक्षित और सम-विकसित किया जाए तो प्रत्येक परिवार में सुख-समृद्धि और शांति संभव है। आज भौतिक जगत में सबकुछ प्राप्त करके भी बहुत कुछ बाकी है, यह अनुभूति अनेक लोगों को स्वयं की खोज के लिए व्याकुल करती है। अगर हम स्त्रियों के विषय में चर्चा करें, तो यह खालीपन की भावना हर एक में मिलेगी।


स्त्री जन्म में एक आत्मा अनेक विलक्षण अनुभवों से गुजरती है। माता, पत्नी, बहन, बेटी, बहू आदि रिश्तों के प्रति उसका धर्म भी निभाना होता है। परंतु क्या इन सबकी पूर्ति के लिए एक स्त्री खुद को सक्षम पाती है ? नहीं! क्योंकि ध्यान का जीवन में अभाव है। ध्यानी महिला का समाज में अभाव है। आध्यात्मिकता में कदम रखने के बाद हमें सबसे पहले कर्म-सिद्धांत को समझना होगा।


हम हर एक असफलता के लिए दूसरों को दोषी ठहराते हैं, स्वयं के कर्म अज्ञान रूपी गठरी में बाँध देते हैं। घरेलू कार्यकलापों में कोई ना कोई मतभेद होते हैं तो हम उसे समझ नहीं पाते। जैसा बोया था वैसा काट रहे हैं। यह स्वीकार कर हम ध्यान द्वारा अपने कर्मों को समझ कर सहज ही सबको माफ करते हैं।


स्त्री में छिपी हुई अनेकानेक सृजनात्मक शक्तियों को बाहर लाने में ध्यान सहायक है। स्त्रियों में रहने वाले प्रेम, करुणा, दया, सहनशीलता आदि दिव्य महान गुण ही आजकल की कठिन परिस्थितियों में समाज की रक्षा कर सकने वाले महान हथियार हैं। क्या हम इनके महत्व को समझकर इनका योग्य उपयोग करते हैं ? नहीं! क्योंकि स्त्री इस अज्ञान में होती है कि वह सब कुछ उसमें है या फिर वह कैसे किससे पूछे। इसीलिए अपने अज्ञान के कवच को तोड़ वास्तविकता में स्वयं का सृजन कर स्त्री के सामर्थ्य को ध्यान के माध्यम से ही जानना सहज संभव है।


जब एक स्त्री ध्यान आरंभ करती है तब वह जल्द ही ध्यान-अवस्था को प्राप्त करती है। ध्यान में प्राप्त ऊर्जा से विलक्षण अनुभूतियों से गुजर कर धीरे-धीरे उसमें बदलाव आने लगता है और अपने अज्ञान से वह बाहर आने लगती है। ज्ञानज्योति के प्रकाश से वह समझने लगती है कि परचर्चा, नंदा-स्तुति, व्यर्थ विचारों पर समय नष्ट करना आदि अज्ञान ही है। पूजा-पाठ, मंत्र-तंत्र आदि केवल अच्छे कर्म करने हेतु थे, परंतु ध्यान ही आत्मज्ञान का एकमेव मार्ग है।


स्त्रियों को शारीरिक अस्वस्थता जल्द ही घेर लेती है। आज हमारी कमाई का बड़ा हिस्सा दवाईयों पर खर्च होता है। उससे हम दुखी हो जाते हैं और कमजोर भी, परंतु एक ध्यानी महिला इस सत्य को जान जाती है कि मानसिक स्वास्थ्य से ही शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है अर्थात् आध्यात्मिक स्वास्थ्य मूल है एवं शारीरिक स्वास्थ्य उसका फल है। भौतिक एवं मानसिक स्वास्थ्य केवल ध्यान से ही संभव है, जहाँ मन की विचाररहित स्थिति को आसानी से पाया जा सकता है।


आज के इस युग में बच्चों को सही मार्गदर्शन देना अत्यंत आवश्यक है। माँ ही पहली गुरु है। परंतु अज्ञानता में बच्चों पर अपनी इच्छाएँ उनपर थोप रहे हैं। कली को फूल की तरह खिलने का मौका नहीं देते। जब एक स्त्री ध्यानी से आत्मज्ञानी बनती है, तब एक जागरूक व्यक्तित्व के रूप में अपने मातृत्त्व का धर्म निभाती है, उसे अपने जीवन उद्देश्य तक पहुँचा कर मैत्रीपूर्ण संबंध निर्माण कर उसे ध्यान शिक्षा से एक सक्षम व्यक्ति बनाने में सफल रहती है। जागृत नारी ही मैत्री भाव से शांतिपूर्ण दाम्पत्य जीवन जी सकती है। एक-एक घर से उठी हुई शांति की लहर धीरे-धीरे विश्व-शांति में परिवर्तित हो जाएगी।


ध्यान महिला सत्र में हमें अपने प्रश्नों का समाधान मिलता है। स्वयं को ध्यान द्वारा जानते हुए यह देश की हर एक स्त्री को संपूर्णता प्राप्त करने हेतु चर्चा की जाती है। आप भी ध्यान का लाभ उठाने के लिए आपके नजदीकी पिरामिड सेंटर से संपर्क करें।


ध्यान मातृत्व


नारी जीवन की सार्थकता मातृत्व में ही निहित है। माँ बनने पर ही नारी को सर्वाधिक सम्मान और गरिमा प्राप्त होती है। किसी कवि ने यह बात अक्षरशः सत्य कही है कि शिशु को अपने गर्भ में धारण कर और नौ महीने तक उसे पालकर, शारीरिक कष्ट सहन कर बालक को इस धरती पर लाने वाली स्त्री मूर्ति ही मातृत्व की मधुरता की अनुभूति करती है।


बालक को गोद में उठाकर देखभाल करते हुए उसका लालन-पालन करते हुए, उसे संरक्षण देते हुए, रेंगने के समय उसे आँखों की पलकों के समान सुरक्षा देते हुए, चलने के समय उंगली की सहायता से उसे चलना सिखाते हुए और भविष्य में उसके महान व्यक्तित्व का निर्माण करने वाली महान मूर्ति ही मातृ-मूर्ति है। जैसे- माता जीजाबाई ने बचपन में दूध पिलाने के साथ-साथ शिवाजी में वीरता, देव भक्ति तथा देशभक्ति के भाव भरे।


महान ... गर्भस्थ शिशु:

हम सब जानते हैं कि किस प्रकार माँ के गर्भ में रहते हुए भी नारद मुनि द्वारा दिए गए उपदेश को ग्रहण करके तथा नारायण मंत्र को स्वीकार करके प्रह्लाद महान विष्णु भक्त बने और विष्णु नृसिंहावतार के कारण बने। सुभद्रा के गर्भ में रहते हुए अभिमन्यु ने अपने पिता अर्जुन को चक्रव्यूह भेदन का तरीका समझाते हुए, सुनकर ही शिक्षा प्राप्त कर ली थी। और महाभारत-युद्ध के दौरान मुसीबत के समय उसी ने चक्रव्यूह-भेदन किया था।


अपनी माता के गर्भ में रहते हुए ही अपने पिता के वेद-पाठ करते सुनकर ही अष्टावक्र ने वेदों को सीख लिया था, यह भी सर्वविदित है।

विषयों को ग्रहण करने की शक्ति, शिशु जन्म से पूर्व ही रखता है। माँ की परिस्थितियों का भी गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव पड़ता है। माँ की शारीरिक व मानसिक परिस्थिति कैसी होनी चाहिए। यदि वह अपने बच्चे को महान बनाना चाहती है? आइए, इस पर विचार करें।


नकारात्मक सोच-विचार से बचें: 

आज हम अपने जीवन पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि समृद्धि पाने व आडम्बरों के पीछे सभी भाग रहे हैं। प्रति क्षण तीव्र शारीरिक व मानसिक दबाव सबके मन पर बना रहता है, जीवन में अशांति, असंतोष, तनाव व दबाव बना रहता है। यदि मां ही तनावग्रस्त है तो उसका पैदा वाला शिशु भी अवश्य प्रभावित होगा, वह स्वास्थ्य व शांति को नहीं पा सकेगा, यदि उस शिशु को हम एक शांत व तनाव रहित वातावरण दे सकें तो यही उसके लिए सर्वोत्तम उपहार होगा।


सत्य न जानने के कारण हम अपनी आन्तरिक दुनिया को नकार रहे हैं। अपनी भीतर छिपे हुए वास्तविक ‘मैं’ को नहीं पहचान रहें। दिनभर में से कुछ समय निकालकर इस असली ‘मैं’ के साथ मिलकर रहें तथा व्यर्थ विषयों से स्वयं को दूर रखें। हर समय दुनिया भर की व्यर्थ की बातों में उलझ कर हम स्वयं भी गलत रास्ते पर पहुंच जाते हैं और आने वाला बच्चा भी रास्ता भटक जाता है। इससे गर्भवती माताओं को बचना चाहिए।


कर्तव्य क्या है ? : 

हम अपने शरीर को तो स्नान द्वारा साफ कर लेते हैं, लेकिन मन में भरी बेकार बातें कैसे दूर की जाएं। उस अशुद्धि को भी स्वच्छ करना जरूरी है। दिन में कुछ समय के लिए बाहर की बातों से स्वयं को हटाकर अपने साथ समय बिताना है, अपने असली ‘मैं’ के साथ रहना है, अपने अन्दर की दुनिया की यात्रा करनी है। इसके लिए एक ही मार्ग है - ध्यान .... ध्यान .... ध्यान ....


शाकाहार ही युक्ताहार है: 

के विकास के लिए शाकाहार ही युक्ताहार है। अगर माँ मांसाहार लेती है तो बच्चे को इतना प्यार नहीं दे पाती। उनमें पारस्परिक सम्बन्ध इतना प्रगाढ़ नहीं होता। पूर्ण ज्ञान व विवेक रहने के कारण शिशु स्वयं जानता है कि जीव हिंसा महापाप है, इसलिए माँ व शिशु के स्वास्थ्य व परस्पर प्रेम के लिए शाकाहार ही उपयुक्त आहार है। गर्भवती माँ को फल, मेवे व सब्जियां अधिक लेना चाहिए, परन्तु एक ही बार में नहीं। उसे थोड़ा-थोड़ा और कई बार में फल लेने चाहिए। गीता में भी युक्ताहार लेने की बात कही गई है।


युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।। 6:17।।


प्रकृति अच्छा संगीत: 

माँ को शास्त्रीय संगीत हमेशा सुनना चाहिए। गायन से अधिक वाद्य संगीत और वाद्यनाद बहुत शक्तिदायक है। हमेशा प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ रहना चाहिए। छोटे प्यारे बच्चों के चित्रों को भी देखते रहना चाहिए। माँ को वह सब करना चाहिए जिससे उसे खुशी मिले। उसे सदा प्रसन्न रहना चाहिए। जन्म के समय भी और बाद के पूरे जीवन भी।


माँ ही प्रथम गुरु है: 

हर प्राणी के लिए सृष्टि में माँ ही प्रथम गुरु है। जन्म के बाद माँ ही बच्चे को हर छोटी-बड़ी बात समझाती है। यदि माँ आरंभ से ही बच्चे को ध्यान करना सिखाए तो वह शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दृष्टि से स्वस्थ होता है, आत्मसंतुष्ट रहता है, कोई भी माँ अपने बच्चे को इससे बढ़कर और क्या दे सकती है ?


माँ को चाहिए कि वह अपने बच्चे को मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीवों पर स्नेह भावना रखना भी सिखाए। सकल प्राणियों के लिए मित्रता संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।


करोड़पति: 

की भौतिक संपत्ति भी किसी को मन की शांति नहीं दे सकती। जो हमेशा खुशी व शांति के साथ रहता है, वही करोड़पति है। अपने बच्चों को असली करोड़पति बनाने वाली मातृमूर्ति का जन्म धन्य है। उस माता के गर्भ से जन्म लेने वाला बच्चा भी धन्य है। हर गर्भिणी, हर माता और हर स्त्री को ध्यानी बनना चाहिए और अपने हर एक बच्चे को भी ध्यानी बनाना चाहिए।


गर्भवती क्या करें-

1. सकारात्मक सोच रखें।

2. शांत, संतुष्ट, तनावरहित रहें।

3. व्यर्थ आलोचनाओं से बचे।

4. ध्यान करें... सज्जन संगति करें।

5. स्वाध्याय करें - उच्च विचार वाले पुस्तक पढ़ें और मनन करें।

6. शाकाहार लें।

7. प्रकृति में समय सुधारें।

8. सुमधुर संगीत सुनें।

9. जीवों के प्रति स्नेह भावना रखें।


इसलिए मैं निराडम्बर से और गर्व से बता सकता हूं हमारा पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटी के मास्टरर्स स्ववित्त ( स्वयं के खर्च ) से स्कूलों, कॉलेजों, गावों, शहरों इत्यादि को गोद लेकर ध्यान प्रशिक्षण दे रहे हैं। हम अनुरोध और निमंत्रण पर मुफ्त कक्षाएं भी आयोजित करते हैं। हम अपने अभियान कार्यक्रमों के हिस्से के रूप में पुस्तिकाएं, ब्रोशर और किताबें वितरित करते हैं।

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